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लोहागढ का इतिहास और किले के मु़ख्यतथ्य के बारे में

महाराजा सूरजमल ने एक अजेय किले की परिकल्पना की थी

जिसके उपरान्त किले के दोनो और मजबूत दरवाजे जिनमें नुकीले लोहे की सलाखें लगायी गयी। उस समय तोपों तथा बारूद का प्रचलन अत्याधिक हुआ करता था जिससे किलों की मजबूत से मजबूत दीवारों को आसानी से ढहाया जा सकता था। इसलिए पहले किले की चैडी चैडी मजबूत पत्थर की ऊॅंची- ऊॅंची प्राचीरें बनायी गयी और अब इन पर तोंपों के गोलों का असर नहीं हो इसके लिए इन दीवारों के चारों ओर सैकडों फुट चैडी कच्ची मिट्टी की दीवार बनायी गयी और नीचे सैकडों फुट गहरी और चैडी खाई बनाकर उसमें पानी भरा गया जिससे दुश्मन के द्वारा तोपों के गोले दीवारों पर दागने के बाद वो मिट्टी में धॅंसकर दम तोड दे और अगर नीचे की ओर प्रहार करे तो पानी में शान्त हो जाए और पानी को पार कर सपाट दीवार पर चढना तो मुश्किल ही नहीं असम्भव था। जिस किले में लेशमात्र भी लोहा नहीं लगा और अपनी अजेय के बल लोहागढ कहलाया। ऐसे थे भरतपुर के दूरदर्शी राजा। लोहागढ किले का निर्माण 18 वीं शताब्दी के आरम्भ में जाट शासक महाराजा सूरजमल ने करवाया था। यह किला भरतपुर के जाट शासकों की हिम्मत और शौर्य का प्रतीक है। अपनी सुरक्षा प्रणाली के कारण यह किला लोहागढ के नाम से जाना गया। यधपि लोहागढ किला इस क्षेत्र के अन्य किलों के समान वैभवशाली नहीं है लेकिन इसकी ताकत और भव्यता अद्भुत है। किले के अन्दर महत्वपूर्ण स्थान है- किशोरी महल खास-ए-मोती महल और कोठी खास-ए-सूरजमल ने मुगलों और अंग्रेजों पर अपनी जीत की याद में किले के अन्दर जवाहर बुर्ज और फतेह बुर्ज बनवायें। यहाँ अष्टधातु से निर्मित एक द्वार भी है जिसमें हाथियों के विशाल चित्र बने हुए है।

पक्षी विहार एवं केवलादेव घना राष्ट्रीय अभ्यारण्य

एशिया में पक्षियों के समूह प्रजातियों वाला सर्वश्रेष्ठ अभ्यारण्य के लिए प्रसिद्व है। एक समय में भरतपुर के राजकुवरों की शाही शिकारगाह रहा यह अभ्यारण्य विश्व के उत्तम पक्षी विहारों में से एक है जिसमें पानी वाले पक्षियों की चार सौं से अधिक प्रजातियों की भरमार है। भूरे पैरों वाले हंस और चीन से धारीदार सिर वाले हंस जुलाई – अगस्त में आते हैं और अक्टूबर -नवम्बर तक उनका प्रवास काल रहता है । उद्रयान के चारों और जलकौंओंए स्पूनबिलएलकलक बगुलोंएजलसिंह इबिस और भूरे बगूलों का समूह देखा जा सकता है।

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